हाल ही भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नार्वे सहित कई देशों की पांच दिवसीय यात्रा पर हैं इसी यात्रा के दौरान नार्वे मिडिया और भारतीय प्रतिनिधि मंडल के बीच एक विवाद खड़ा हो गया।
इस पूरे विवाद के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
1. प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल न लेने पर बहस
विवाद की शुरुआत तब हुई जब पीएम मोदी और नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर (Jonas Gahr Støre) ने एक संयुक्त प्रेस वक्तव्य (Joint Press Statement) जारी किया।
पत्रकार का हस्तक्षेप: इस दौरान नॉर्वे के अखबार Dagsavisen की पत्रकार हेले लिंग स्वेंडसेन (Helle Lyng Svendsen) ने जोर से चिल्लाकर सवाल किया, "प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस (Freest Press) से सवाल क्यों नहीं ले रहे हैं?" पीएम मोदी बिना जवाब दिए वहां से आगे बढ़ गए, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
MEA की प्रेस मीट में तीखी नोकझोंक: इसके बाद जब भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) के अधिकारी सिबी जॉर्ज ने एक अलग प्रेस कॉन्फ्रेंस की, तो वही पत्रकार वहां भी मौजूद थीं। उन्होंने भारत में मानवाधिकारों और प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर तीखे सवाल पूछे और कहा कि "हम आप पर भरोसा क्यों करें?"
भारतीय विदेश मंत्रालय का करारा जवाब: इस पर भारतीय राजनयिक सिबी जॉर्ज ने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने भारत के 5000 साल पुराने इतिहास, कोविड काल में की गई वैक्सीन डिप्लोमेसी और 1947 से महिलाओं को मिले वोटिंग राइट्स का हवाला दिया। उन्होंने तीखे लहजे में कहा कि "लोग कुछ अज्ञानी एनजीओ (Ignorant NGOs) की एक-दो रिपोर्ट पढ़ लेते हैं और बिना भारत के स्केल को समझे सवाल पूछने आ जाते हैं। अगर किसी को लगता है कि अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, तो वह अदालत (Court) जा सकता है।"
2. विवादित 'सपेरा' कार्टून पर बवाल
इस घटना के ठीक बाद नॉर्वे के एक प्रमुख अखबार 'Aftenposten' ने एक ओपिनियन लेख छापा, जिसका शीर्षक था— "A Cunning and Slightly Disturbing Man" (एक चतुर और थोड़ा परेशान करने वाला व्यक्ति)।
नस्लवादी कार्टून का आरोप: इस लेख के साथ पीएम मोदी का एक कार्टून पब्लिश किया गया, जिसमें उन्हें एक सपेरे (Snake Charmer) के रूप में दिखाया गया, जो हाथ में सांप जैसी दिखने वाली फ्यूल पाइप (तेल की पाइप) पकड़े हुए हैं।
भारतीयों का गुस्सा: इस कार्टून के सामने आते ही सोशल मीडिया पर भारतीयों और भारतीय समर्थकों का गुस्सा भड़क गया। लोगों ने इसे पश्चिमी देशों की पुरानी और नस्लवादी (Racist) मानसिकता करार दिया, जो आज भी भारत को 'सपेरों का देश' मानती है। आलोचकों का कहना है कि भारत की वैश्विक प्रगति को न पचा पाने के कारण पश्चिमी मीडिया ऐसी औपनिवेशिक रूढ़िवादिता (Colonial Stereotypes) का सहारा ले रहा है।
3. राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
इस मुद्दे पर भारत में भी राजनीति तेज हो गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी सहित विपक्ष के नेताओं ने पीएम मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि लोकतांत्रिक देशों में प्रेस के सवालों का सामना करना जरूरी है। वहीं, सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोग भारतीय विदेश मंत्रालय के कड़े रुख और नॉर्वे के मीडिया आउटलेट्स की इस हरकत के खिलाफ भारतीय पक्ष का समर्थन कर रहे हैं।
जबकि नार्वे मिडिया विश्वभर में प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में पहले स्थान पर है वहीं भारतीय मिडिया की बात करें 157 वे स्थान पर है।
PM Modi Norway visit press conference row,
Helle Lyng Svendsen PM Modi,
Norway journalist questions PM Modi,
Indian MEA reply to Norway media,
Sibi George Norway press meet 2026
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें